Monday, September 29, 2008

By Ahmed Faraaz

अब के हम बिछडे तो शायाद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूंढ उजडे हुए लोगों में वफ़ा के मोंती
ये खज़ाने तुझे मुम्किन है कराबों में मिलें

तू खुदा है न है मेरा इश्क फरिश्तों जैसा
दोनों इंसान हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

गम-ऐ-दुनिया भी गम-ऐ-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

अब ना वो मैं हूँ न वो तू हैं न वो माज़ी फ़राज़
जैसे दो साए तमन्नाओं के सराबों में मिलें

Wednesday, September 24, 2008

न जाने कितने

बिन तेरे बीत गए यार ज़माने कितने
ये बता और करेगा तू बहाने कितने

फिर सर-ऐ-शाम तेरे ज़िक्र ने चीरा मेहफ़िल को
हो गए फिर से हरे ज़ख्म पुराने कितने

एक मैं ने तेरी आवाज़ पे लब्बैक था कहा
कि नाम लेने वाले थे तेरे लोग न जाने कितने

छीनले न तुझको यह ज़माना कहीं मुझसे
मैंने इस खौफ से बदले ठिकाने कितने

वाये असूस भी तो वहीँ प्यार का नीलाम हुआ
गाये जाते थे जहाँ प्यार के तराने कितने

आज उस शहर से भी शहर बदर होना पड़ा
हम ने देखे थे जहाँ ख्वाब सुहाने कितने

मेरी बस्ती का मुक़द्दर था फक्त तेरा शेय्ह
लोग तो आए थे यहाँ दीप जलाने कितने

एक तेरी याद से वाबस्ता है कितनी यादें
इस नए से शेहेर में हैं शेहेर पुराने कितने

आदमी फिर भी तो गुमान से बाहर नही निकला
मुझसे यूँ तो देखे है खुदा ने नजाने कितने