Saturday, July 13, 2013

By शकीला 'बानो' भोपाली (Shakila 'Baano' Bhopali)

वो एक शख्स जो दिल को भला भला सा लगे
उसी से मेरा मुकद्दर खफा खफा सा लगे 

यह आँधियों की नवाज़िश यह ज़ुल्मतो का करम 
कि हर चिराग-ए-तमन्ना बुझा बुझा सा लगे 

तुम्हारे ख़त में हर एक बात साफ़ लिखी है 
बस एक लफ्जे मोहब्बत मिटा मिटा सा लगे 

न अजनबी की तरह और न आशना की तरह 
यह कौन है की जो सब से जुदा जुदा सा लगे 

तेरे लबो पर तबस्सुम तो है मगर 'बानो'
है क्या सबब की तेरा दिल दुखा दुखा सा लगे 

शकीला 'बानो' भोपाली

क्या हो गया होगा - शेह्नाज़ मोहसिन (Shehnaaz Mohsin)

घावों से चूर हो गया होगा 
उनसे जो दूर हो गया होगा 

घुट के जीने और तड़पने के लिए 
वो तो मजबूर हो गया होगा 

रात दिन आसुओ से ही धुल्कर 
चेहरा पुर नूर हो गया होगा 

प्यार करने पे सूली लटकना 
जग का दस्तूर हो गया होगा 

हर तरफ होंगे उन्ही के चर्चे 
नाम मशहूर हो गया होगा 

इतने थे फासले की तय करके 
थक के चूर हो गया होगा 

पूछो मत क्या दशा हुई होगी 
तुमसे जब दूर हो गया होगा 


शेह्नाज़ मोहसिन 

By नौशाद (Noushaad)

 जुल्फें बिखरी है रूखे रौशन पर 
या घटा छा गई है गुलशन पर 

दिल की तारीख लिख रहा हु मैं 
आसुओं के सहारे दामन पर 

लुट गए गीत उजड़ गए झूले 
ऑस पड़ जाए ऐसे सावन पर 

दोस्तों ने किये है ऐसे करम 
प्यार आने लगा है दुश्मन पर 

तीर मेरे जिगर को तक्ता है 
मेरी नज़र है तीर अफगन पर 


नौशाद 

रह गई (Reh gai) - अंजुम रहबर (Anjum Rehbar)

एक सूनी शाम मेरे फ़साने में रह गई
मैं दूसरो की शम्मा जलाने में रह गई

गलियों में रुख्स करने लगी दोपहर की धूप
मैं अपने साथियो को जगाने में रह गई

वो आके मेरे गाँव से वापस भी जा चूका
मैं थी के अपने घर को सजाने में रह गई

वापस हुई तो घर मेरा शोलो की जद में था
मैं मंदिरों के दीप जलाने में रह गई

दुनिया से सारी उम्र तार्रुफ़ न हो सका
अंजुम मैं खुद को खुद से मिलाने में रह गई