ज़िक्र-ऐ-शब्-ऐ-फिराक से वेह्शत उसे भी थी
मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी
मुझ को भी शौक था नए चेहरों के दीद का
रास्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी
वोह मुझ से बर्ह के ज़ब्त का आदि था जी गया
वरना हर एक सास क़यामत उसे भी थी
मुझ से बिछड़ के शहर में घुल मिल गया वो शक्स
हाला के शेह्सर बशर से अदावत उसे भी थी
उस रात देर तक रहा वो मेहव-ऐ-गुफ्तगू
मसरूफ मैं भी कम था फ़राघत उसे भी थी
सुनता था वो भी सबसे पुरानी कहानियाँ
शायद रफ़ाक़तों की ज़रूरत उसे भी थी
तनहा हुआ सफर में तो मुझ पर खुला ये भेद
साए से प्यार, धुप से नफरत उसे भी थी
"मोहसिन" मैं उस से कह न सका यूँ भी हाल-ऐ-दिल
दरपेश एक ताज़ा मुसीबत उसे भी थी
शब्-ऐ-फिराक - जुदाई की रात
दीद - दीदार
बर्ह के ज़ब्त का - बिछड़ के रहने का
शहर बशर - भीड़ में मिल के रहना
मेहव-ऐ-गुफ्तगू - महफिल में बैठ कर बातें करते रहना
मसरूफ - busy
फ़राघत - ज़रूरी कामो से फुर्सत
रफाकत - सीख, अच्छी समझ
दरपेश - किसी से आमने सामने मिलना
Monday, October 13, 2008
Tuesday, October 7, 2008
आदम
खुश कुर्बत में न आशियाने में, दिल सा दुश्मन नहीं ज़माने में।
क्या बुरा है जो खुलकर रो लिए, सौ तक़ल्लुफ़ है मुस्कुराने में।
रोने का आलम तो ऐसा था, हम झूम के सावन तक पहौंचे,
दो चार ही आंसू ऐसे थे जो आप के दामन तक पहौंचे।
विराना हमारा क्या कम था, किस्मत में अपनी जब गम था,
हर फूल मिला कांतों की तरह, हम किस लिए गुलशन तक पहौंचें।
सोचा था कुछ सुकून पायेंगे, मालूम न था कि पछताएंगे,
ज़ुल्फ़ों के भरोसे चल के, पहुंचे भी तो उलझन तक पहौंचे।
मतलब के अंधेरों में 'आदम', सूरज भी नज़र कब आता है,
वो दोस्त थे मेरे अपने ही, जो मेरे दुश्मन तक पहौंचें.
क्या बुरा है जो खुलकर रो लिए, सौ तक़ल्लुफ़ है मुस्कुराने में।
रोने का आलम तो ऐसा था, हम झूम के सावन तक पहौंचे,
दो चार ही आंसू ऐसे थे जो आप के दामन तक पहौंचे।
विराना हमारा क्या कम था, किस्मत में अपनी जब गम था,
हर फूल मिला कांतों की तरह, हम किस लिए गुलशन तक पहौंचें।
सोचा था कुछ सुकून पायेंगे, मालूम न था कि पछताएंगे,
ज़ुल्फ़ों के भरोसे चल के, पहुंचे भी तो उलझन तक पहौंचे।
मतलब के अंधेरों में 'आदम', सूरज भी नज़र कब आता है,
वो दोस्त थे मेरे अपने ही, जो मेरे दुश्मन तक पहौंचें.
आदम
बशीर बद्र
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा ।
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा ।
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेगे, रास्ता हो जाएगा ।
कितना सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया,
तू नहीं मेरा तो कोई, दूसरा हो जाएगा ।
मैं खूदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तो,
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा ।
सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बु, ज़मीनो-आस्माँ,
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा ।
Monday, September 29, 2008
By Ahmed Faraaz
अब के हम बिछडे तो शायाद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूंढ उजडे हुए लोगों में वफ़ा के मोंती
ये खज़ाने तुझे मुम्किन है कराबों में मिलें
तू खुदा है न है मेरा इश्क फरिश्तों जैसा
दोनों इंसान हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
गम-ऐ-दुनिया भी गम-ऐ-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
अब ना वो मैं हूँ न वो तू हैं न वो माज़ी फ़राज़
जैसे दो साए तमन्नाओं के सराबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूंढ उजडे हुए लोगों में वफ़ा के मोंती
ये खज़ाने तुझे मुम्किन है कराबों में मिलें
तू खुदा है न है मेरा इश्क फरिश्तों जैसा
दोनों इंसान हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
गम-ऐ-दुनिया भी गम-ऐ-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
अब ना वो मैं हूँ न वो तू हैं न वो माज़ी फ़राज़
जैसे दो साए तमन्नाओं के सराबों में मिलें
Wednesday, September 24, 2008
न जाने कितने
बिन तेरे बीत गए यार ज़माने कितने
ये बता और करेगा तू बहाने कितने
फिर सर-ऐ-शाम तेरे ज़िक्र ने चीरा मेहफ़िल को
हो गए फिर से हरे ज़ख्म पुराने कितने
एक मैं ने तेरी आवाज़ पे लब्बैक था कहा
कि नाम लेने वाले थे तेरे लोग न जाने कितने
छीनले न तुझको यह ज़माना कहीं मुझसे
मैंने इस खौफ से बदले ठिकाने कितने
वाये असूस भी तो वहीँ प्यार का नीलाम हुआ
गाये जाते थे जहाँ प्यार के तराने कितने
आज उस शहर से भी शहर बदर होना पड़ा
हम ने देखे थे जहाँ ख्वाब सुहाने कितने
मेरी बस्ती का मुक़द्दर था फक्त तेरा शेय्ह
लोग तो आए थे यहाँ दीप जलाने कितने
एक तेरी याद से वाबस्ता है कितनी यादें
इस नए से शेहेर में हैं शेहेर पुराने कितने
आदमी फिर भी तो गुमान से बाहर नही निकला
मुझसे यूँ तो देखे है खुदा ने नजाने कितने
ये बता और करेगा तू बहाने कितने
फिर सर-ऐ-शाम तेरे ज़िक्र ने चीरा मेहफ़िल को
हो गए फिर से हरे ज़ख्म पुराने कितने
एक मैं ने तेरी आवाज़ पे लब्बैक था कहा
कि नाम लेने वाले थे तेरे लोग न जाने कितने
छीनले न तुझको यह ज़माना कहीं मुझसे
मैंने इस खौफ से बदले ठिकाने कितने
वाये असूस भी तो वहीँ प्यार का नीलाम हुआ
गाये जाते थे जहाँ प्यार के तराने कितने
आज उस शहर से भी शहर बदर होना पड़ा
हम ने देखे थे जहाँ ख्वाब सुहाने कितने
मेरी बस्ती का मुक़द्दर था फक्त तेरा शेय्ह
लोग तो आए थे यहाँ दीप जलाने कितने
एक तेरी याद से वाबस्ता है कितनी यादें
इस नए से शेहेर में हैं शेहेर पुराने कितने
आदमी फिर भी तो गुमान से बाहर नही निकला
मुझसे यूँ तो देखे है खुदा ने नजाने कितने
Monday, August 25, 2008
By अंजुम रहबर (Anjum Rehbar)
मिलना था इत्तेफाक, बिछड़ना नसीब था,
वो उतना ही दूर हो गया जितना करीब था।
मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई,
जिस शख्स की हथेली में मेरा नसीब था।
बस्ती के सारे लोग ही आतिश परस्त थे,
घर जल रहा था जब की समंदर करीब था।
दफना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में,
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का गरीब था।
"अंजुम" मैं जीत कर भी यही सोचती रह गई,
जो हार कर गया बड़ा खुशनसीब था।
आतिश परस्त - आग पसंद करनेवाले
वो उतना ही दूर हो गया जितना करीब था।
मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई,
जिस शख्स की हथेली में मेरा नसीब था।
बस्ती के सारे लोग ही आतिश परस्त थे,
घर जल रहा था जब की समंदर करीब था।
दफना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में,
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का गरीब था।
"अंजुम" मैं जीत कर भी यही सोचती रह गई,
जो हार कर गया बड़ा खुशनसीब था।
आतिश परस्त - आग पसंद करनेवाले
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