Monday, September 29, 2008

By Ahmed Faraaz

अब के हम बिछडे तो शायाद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूंढ उजडे हुए लोगों में वफ़ा के मोंती
ये खज़ाने तुझे मुम्किन है कराबों में मिलें

तू खुदा है न है मेरा इश्क फरिश्तों जैसा
दोनों इंसान हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

गम-ऐ-दुनिया भी गम-ऐ-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

अब ना वो मैं हूँ न वो तू हैं न वो माज़ी फ़राज़
जैसे दो साए तमन्नाओं के सराबों में मिलें

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