Tuesday, August 11, 2009

Author unknown

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते,
किसी की आँख में रहकर संवर गए होते।


सिंगार दान में रहते हो आईने की तरह,
किसी के हाथ से गिरकर बिखर गए होते।

अजीब रात थी कल तुम भी आकर लौट गए,
जब आ गए थे तो पलभर ठहर गए होते।

बोहत दीन से था अपना दिल खाली खाली,
खुशी से नही तो उदासी से भर गए होते।

किसी की याद में पल्के ज़रा भिगो लेते,
उदास रात की तन्हाइयो में रो गए होते।

दू:खो का बोझ अकेले नही स्मभ्लता है,
कही वो मिलते तो उनसे लिपट कर रो गए होते।

अगर सफर में कोई हमारा भी हमसफ़र होता,
बड़ी खुशी से उन्ही पत्थरो पर सो गए होते।

तुम्हारी राह में शाखों के फूल सूख गए,
कभी हवा की तरह इस तरफ़ भी हो गए होते।

ये क्या की रोज़ वोही चांदी का बिस्तर हो,
कभी तो धुप की चादर बिछा के सो गए होते।

Friday, May 8, 2009

Author Unknown

कोई हमसफ़र मिला नही, उम्र तमाम ढल गई
अब तो हसरतें मेरी एक ख्वाब बन गई।
ज़िन्दगी का यह सफर न अब सफर कहलायेगा
हर कदम पर ज़िन्दगी बस थोडी सी बिखर गई।

हर नज़ारा यूँ खफा है, बुझते सितारों की तरह
अब तो रौशनी भी मेरी एक याद बन गई।
क्या गिला किसीसे करे, क्या खता किस की कहें
यूँ जुबां बे नगमो की एक फेहरीस्त बन गई।
क्यों दुवाओं, बद्दुवाओ का शरीके शखरा हो
अब ज़िन्दगी मेरी बस पल भर की मेहमांबन गई।