कोई हमसफ़र मिला नही, उम्र तमाम ढल गई
अब तो हसरतें मेरी एक ख्वाब बन गई।
ज़िन्दगी का यह सफर न अब सफर कहलायेगा
हर कदम पर ज़िन्दगी बस थोडी सी बिखर गई।
हर नज़ारा यूँ खफा है, बुझते सितारों की तरह
अब तो रौशनी भी मेरी एक याद बन गई।
क्या गिला किसीसे करे, क्या खता किस की कहें
यूँ जुबां बे नगमो की एक फेहरीस्त बन गई।
क्यों दुवाओं, बद्दुवाओ का शरीके शखरा हो
अब ज़िन्दगी मेरी बस पल भर की मेहमांबन गई।
Friday, May 8, 2009
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