Monday, October 13, 2008

By Mohsin 'मोहसिन'

ज़िक्र-ऐ-शब्-ऐ-फिराक से वेह्शत उसे भी थी
मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी

मुझ को भी शौक था नए चेहरों के दीद का
रास्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी

वोह मुझ से बर्ह के ज़ब्त का आदि था जी गया
वरना हर एक सास क़यामत उसे भी थी

मुझ से बिछड़ के शहर में घुल मिल गया वो शक्स
हाला के शेह्सर बशर से अदावत उसे भी थी

उस रात देर तक रहा वो मेहव-ऐ-गुफ्तगू
मसरूफ मैं भी कम था फ़राघत उसे भी थी

सुनता था वो भी सबसे पुरानी कहानियाँ
शायद रफ़ाक़तों की ज़रूरत उसे भी थी

तनहा हुआ सफर में तो मुझ पर खुला ये भेद
साए से प्यार, धुप से नफरत उसे भी थी

"मोहसिन" मैं उस से कह न सका यूँ भी हाल-ऐ-दिल
दरपेश एक ताज़ा मुसीबत उसे भी थी


शब्-ऐ-फिराक - जुदाई की रात
दीद - दीदार
बर्ह के ज़ब्त का - बिछड़ के रहने का
शहर बशर - भीड़ में मिल के रहना
मेहव-ऐ-गुफ्तगू - महफिल में बैठ कर बातें करते रहना
मसरूफ - busy
फ़राघत - ज़रूरी कामो से फुर्सत
रफाकत - सीख, अच्छी समझ
दरपेश - किसी से आमने सामने मिलना

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