Tuesday, October 7, 2008

आदम

खुश कुर्बत में न आशियाने में, दिल सा दुश्मन नहीं ज़माने में।
क्या बुरा है जो खुलकर रो लिए, सौ तक़ल्लुफ़ है मुस्कुराने में।

रोने का आलम तो ऐसा था, हम झूम के सावन तक पहौंचे,
दो चार ही आंसू ऐसे थे जो आप के दामन तक पहौंचे।

विराना हमारा क्या कम था, किस्मत में अपनी जब गम था,
हर फूल मिला कांतों की तरह, हम किस लिए गुलशन तक पहौंचें।

सोचा था कुछ सुकून पायेंगे, मालूम न था कि पछताएंगे,
ज़ुल्फ़ों के भरोसे चल के, पहुंचे भी तो उलझन तक पहौंचे।

मतलब के अंधेरों में 'आदम', सूरज भी नज़र कब आता है,
वो दोस्त थे मेरे अपने ही, जो मेरे दुश्मन तक पहौंचें.
आदम

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