एक सूनी शाम मेरे फ़साने में रह गई
मैं दूसरो की शम्मा जलाने में रह गई
गलियों में रुख्स करने लगी दोपहर की धूप
मैं अपने साथियो को जगाने में रह गई
वो आके मेरे गाँव से वापस भी जा चूका
मैं थी के अपने घर को सजाने में रह गई
वापस हुई तो घर मेरा शोलो की जद में था
मैं मंदिरों के दीप जलाने में रह गई
दुनिया से सारी उम्र तार्रुफ़ न हो सका
अंजुम मैं खुद को खुद से मिलाने में रह गई
मैं दूसरो की शम्मा जलाने में रह गई
गलियों में रुख्स करने लगी दोपहर की धूप
मैं अपने साथियो को जगाने में रह गई
वो आके मेरे गाँव से वापस भी जा चूका
मैं थी के अपने घर को सजाने में रह गई
वापस हुई तो घर मेरा शोलो की जद में था
मैं मंदिरों के दीप जलाने में रह गई
दुनिया से सारी उम्र तार्रुफ़ न हो सका
अंजुम मैं खुद को खुद से मिलाने में रह गई

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